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स्कूल की किताबों की कीमतों पर बड़ा सवाल
देशभर में स्कूली किताबों की बढ़ती कीमतों ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। हर साल नए सत्र की शुरुआत के साथ ही किताबों के दाम आसमान छूने लगते हैं, जिससे आम परिवारों पर आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
क्या वाकई इतनी महंगी होती है किताब छापने की लागत?
विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य कागज पर छपने वाली किताबों की लागत इतनी अधिक नहीं होती, जितनी कीमत बाजार में वसूली जाती है। इसके बावजूद स्कूलों और निजी प्रकाशकों द्वारा तय की गई कीमतें कई गुना ज्यादा होती हैं।
अभिभावकों की जेब पर असर
मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए हर साल हजारों रुपये सिर्फ किताबों पर खर्च करना मजबूरी बन गया है। कई जगहों पर स्कूल विशेष दुकानों से ही किताबें खरीदने का दबाव भी बनाते हैं।
पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल
किताबों की कीमत तय करने की प्रक्रिया और कमीशन सिस्टम को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि इस पूरे सिस्टम में पारदर्शिता की कमी है।
मांग उठी – सरकार करे हस्तक्षेप
अभिभावकों और सामाजिक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि स्कूली किताबों की कीमतों पर नियंत्रण लगाया जाए और एक पारदर्शी नीति बनाई जाए, ताकि आम जनता को राहत मिल सके।